Shivam Tripathi, Amar Singh / Udantak
भारतीय राजनीति में रणनीतिकारों की एक नई पीढ़ी उभर रही है जो न विरासत से आती है, न सिफारिश से। यह पीढ़ी आती है जमीन से, डेटा से और जनता के बीच बिताए उन अनगिनत घंटों से जो किसी कैमरे ने नहीं देखे। प्रियेश राज इसी पीढ़ी का सबसे चर्चित नाम बनकर उभर रहे हैं।
रोहतास जिले के बिक्रमगंज शहर के मोरोना गांव की पगडंडी से शुरू हुआ सफर
प्रियेश की राजनीतिक यात्रा किसी बड़े मंच से नहीं, बल्कि JSPT संगठन के जमीनी काम से शुरू हुई। कार्यकर्ता समन्वय, संगठन निर्माण और जनता से सीधा संवाद यही उनकी पहली पाठशाला रही। पदयात्रा के दौरान गाँव-गाँव पैदल चलकर जनता की समस्याएँ सुनना उनकी राजनीतिक सोच की असली बुनियाद बना।
यह वह अनुभव था जो किसी रणनीतिकार को स्प्रेडशीट से नहीं, बल्कि धूप और धूल से मिलता है।
इमामगंज से मिली पहली बड़ी पहचान
इमामगंज उपचुनाव उनके करियर का पहला बड़ा मोड़ साबित हुआ। बूथ प्रबंधन से लेकर जनसंपर्क तक उनकी कार्यशैली ने वरिष्ठ नेतृत्व का ध्यान खींचा। इसके बाद उन्हें सारण डिवीजन का प्रभारी बनाया गया, जहाँ उन्होंने संगठन को नई दिशा और ऊर्जा दी।
प्रशांत किशोर कि “बिहार बदलाव यात्रा” में हेड लीड की भूमिका ने उन्हें राज्यव्यापी पहचान दिलाई। शेखपुरा हाउस की बैठकों में जब चुनाव समिति टिकट वितरण और रणनीति पर मंथन करती, तो प्रियेश की राय गंभीरता से सुनी जाने लगी यह छोटी बात नहीं थी।
243 सीटें, एक वॉर रूम, एक युवा कमांडर
बिहार विधानसभा चुनाव में प्रियेश राज को वॉर रूम का प्रमुख बनाया गया। राज्य की सभी 243 विधानसभा सीटों की चुनावी रणनीति, डेटा प्रबंधन और प्रचार अभियान की कमान एक युवा के हाथ में थी।
यह जिम्मेदारी जितनी बड़ी थी, उतनी ही जोखिम भरी भी। लेकिन प्रियेश ने न केवल इसे संभाला, बल्कि अपनी टीम को एकजुट रखते हुए चुनावी मशीनरी को घड़ी की तरह चलाया। उनकी तेज राजनीतिक समझ और डेटा-आधारित रणनीति ने उन्हें बिहार के सबसे चर्चित युवा चुनावी रणनीतिकारों में शुमार कर दिया।
बंगाल में लिखी नई इबारत 14 में से 12 सीटें
बिहार की सफलता के बाद प्रियेश को बंगाल में भी बड़ी परीक्षा देनी पड़ी। भाजपा राष्ट्रीय महासचिव सुनील बंसल के साथ मिलकर उन्हें 14 विधानसभा सीटों की जिम्मेदारी सौंपी गई जिनमें दमदम और बैरकपुर जैसी संवेदनशील लोकसभा और प्रतिस्पर्धी सीटें शामिल थीं।
बंगाल की राजनीतिक जमीन बिहार से बिल्कुल अलग है भाषा अलग, मिजाज अलग, चुनौतियाँ अलग। लेकिन प्रियेश की रणनीति और संगठन क्षमता ने वहाँ भी रंग दिखाया। 14 में से 12 सीटों पर जीत यह आँकड़ा खुद अपनी कहानी कहता है।
शिक्षा और राजनीति का अनोखा मेल
इलाहाबाद विश्वविद्यालय से वैचारिक समझ और भारतीय जनसंचार संस्थान (IIMC), नई दिल्ली से मीडिया की गहरी समझ प्रियेश राज की यह शैक्षणिक पृष्ठभूमि उन्हें भीड़ से अलग करती है। वे जानते हैं कि संदेश कैसे बनता है और वह जनता तक कैसे पहुँचता है।
आज के समय वो भाजपा कार्यालय दिल्ली में उत्तर प्रदेश जैसे राज्य को राजनैतिक रूप में समझ रहे हैं, ये उस नई राजनीतिक पीढ़ी के प्रतिनिधि हैं जो मानती है राजनीति सत्ता पाने का साधन नहीं, समाज बदलने का माध्यम है।