Group of rural children playing outdoor in the nature.
दोपहर में
सूरज के तिखे धूप में
जब उचट जाता है मन,
पलकें समेटती
झुंझलाने लगती है आँखें
तब याद आता है
उषा के अरुणाम्बर उदर से
निकलता किलकारी मारता रवि,
तब याद आती है “बचपना”
हां वही जो
खुशी, उमंग, ऊर्जा, जिद्द
और प्रेम से लबरेज़ है।
पुनः लौट जाना चाहता हूँ
मैं भी उसी दौर में।
यूं ही उस दौर को बटोरने
निकल पड़ता हूँ
अपने विद्यालय के बगीचे में,
जहाँ सतत जीवित रहती है “बचपना”
ढूंढने लगता हूँ उस बक्से को
जिसमें माँ बड़े हिफ़ाज़त से रखी है
कुछ ढाई बीते के कुर्तें
और कुछ एक बीते की हॉफ़ पैंट।
कभी-कभी तो सड़क के किनारे से भी
उठा लेता हूँ उस बचपना को
जहाँ कुछ कुत्ते के पिल्ले
हड्डी लेकर एक-दूसरे के साथ
करते हैं छिन्ना – झपटी,
गड़ाते हैं दांत एक – दूसरे को
और लोटने लगते हैं धूल में।
रचनाकार: संदीप कुमार