रिपोटिंग By Rahul
बिहार विधानसभा चुनाव की मतगणना हो चुकी है। और बिहार में फिर से एनडीए की सरकार बनने जा रही है। एनडीए ने 2010 को दोहराते हुए इस बार सबसे बड़ी बहुमत के साथ वापसी की है। और विपक्षी दल को कुछ मात्र सीटों पर निपटा दिया है।
बिहार चुनाव का नतीजा 14 नवंबर शुक्रवार को घोषित किया गया, जिसमें बिहार की जनता का विश्वास जीतते हुए एनडीए बड़ी बहुमत के साथ बिहार में फिर लौट आई है और महागठबंधन को करारी हार का सामना करना पड़ा। बिहार के मतदाताओं के बीच में नीतीश कुमार अभी भी मजबूत चेहरा बने हुए हैं।
बिहार विधानसभा चुनाव की 243 सीटों में से 202 सीटें एनडीए गठबंधन ने जीत ली हैं। इसमें बीजेपी को 89, जदयू को 85, लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) को 19, हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा को 5 और उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी राष्ट्रीय लोक मोर्चा को 4 सीटें आई हैं।
महागठबंधन के हिस्से में महज 35 सीटें आईं। इसमें राष्ट्रीय जनता दल की 25, कांग्रेस की 6, सीपीआई (एमएल) की 2, इंडियन इन्क्लूसिव पार्टी (आईआईपी) और सीपीआई (एम) को एक-एक सीट पर जीत मिली है। बाकी बची 6 सीटों में से 5 एआईएमआईएम और एक बसपा जीतने में कामयाब रही।
नीतीश कुमार के जनाधार से एनडीए की बड़ी बहुमत
बिहार के लोग आज भी नीतीश कुमार को बेहतर मुख्यमंत्री मानते हैं। बिहार के लोगों का मानना है कि नीतीश कुमार पर कोई भ्रष्टाचार का आरोप नहीं है। नीतीश की सेकुलर राजनीति ने बिहार के सभी समुदायों में जनाधार बना हुआ है। जातीय समीकरणों के इर्द-गिर्द घूमने वाली बिहार की राजनीति में कम आबादी वाली जाति से आने के बावजूद नीतीश कुमार ने बहुत चतुराई से अपना वोट बैंक तैयार किया है। जदयू को हमेशा से कुर्मी, कोइरी, अतिपिछड़ा वर्ग और महादलित व मुसलमान समुदायों का मजबूत समर्थन मिलता रहा है। सत्ता में रहते हुए नीतीश कुमार ने ‘सबको साथ लेकर चलने’ की अपनी राजनीति के जरिए इन तबकों की राजनीतिक हिस्सेदारी बढ़ाई, खासकर कोटा के अंदर कोटा लागू करवाने के प्रयासों से। इन समुदायों के कई लोग उन्हें यादव-प्रधान आरजेडी और सवर्ण-प्रधान बीजेपी की तुलना में एक ज्यादा संतुलित और सहज नेता मानते हैं। कई गैर-यादव ओबीसी और गैर-पासवान दलित समुदायों के लिए नीतीश कुमार वह नेता हैं जो ज्यादा प्रभावी और दबंग जातियों के मुकाबले उनके हितों की सुरक्षा कर सकते हैं।
एनडीए की बहुमत में महिलाओं की भूमिका
बिहार चुनाव की घोषणा से ठीक कुछ दिनों पहले जीविका से जुड़ी महिलाओं को कारोबार के लिए 10-10 हजार रुपये दिए गए। इससे पहले उन्हें ब्याज पर ही ऋण मिलता था, लेकिन पहली बार यह राशि बिना ब्याज के और वापस न करने की शर्त के साथ वितरित की गई। यह कदम चुनाव में एनडीए के लिए ‘मास्टर स्ट्रोक’ साबित हुआ। पुरुषों की तुलना में महिलाओं ने इस बार भी मतदान में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। जहां 62.98 प्रतिशत पुरुषों ने ही मतदान किया वहीं 71.78 प्रतिशत महिलाएं मतदान के लिए बूथ तक पहुंचीं। एनडीए की इस बड़ी जीत में महिला वोटरों की भूमिका सबसे अहम मानी जा रही है। साल 2005 में सत्ता में आने के बाद से ही नीतीश कुमार ने महिलाओं को ध्यान में रखते हुए कई योजनाएं शुरू कीं। लड़कियों को साइकिल वितरण, पंचायत चुनावों में महिलाओं के लिए आरक्षण, शराबबंदी आदि। इन कदमों ने महिलाओं में उनकी मजबूत पकड़ बनाई है।
महागठबंधन नीति में लीकेज का कारण
बिहार चुनाव के पहले और चुनाव तक महागठबंधन घटक दलों में खींचतानी रही, जहां विपक्षी दल एनडीए अपने सहयोगियों के साथ बिहार की जनता के बीच में अपना नैरेटिव गढ़ने और चुनावी नीति बनाने में लगा था वहीं महागठबंधन के भीतर सीट शेयरिंग और मुख्यमंत्री एवं उपमुख्यमंत्री बहस मुख्य कारण बताया जा रहा है। तेजस्वी यादव का नीतिगत कार्य बिहार चुनाव में धीमा दिखा। नामांकन के आखिरी दिन तक राजद ने टिकट वितरित किया वहीं 8 से ज्यादा सीटों पर महागठबंधन सहयोगी दल फ्रेंडली फाइट बताकर आपस में भी भिड़ गए। बिहार चुनाव में खराब मौसम होने के कारण 2020 की तुलना में तेजस्वी ने लगभग आधी संख्या में चुनावी सभाएं कीं। राहुल गांधी भी चुनाव में कम ही दिखे। जबकि अमित शाह लगातार कई दिनों तक पटना में ही डेरा डाले रहे। महागठबंधन में मजबूत साथी मानी जाने वाली पार्टी लेफ्ट भी इस बार कोई खास प्रदर्शन करती नजर नहीं आई वहीं उपमुख्यमंत्री की लालसा लिए मुकेश सहनी का खाता तक नहीं खुला। 2020 के मुकाबिक तेजस्वी यादव नए वोटरों में अपनी जगह नहीं बना पाए जबकि तेजस्वी ने भी राजनीतिक सभाओं में कई घोषणाएं कीं, मई बहिन सम्मान योजना या हर घर नौकरी या जीविका को लेकर हों लेकिन चुनाव परिणाम में कुछ असर नहीं दिखा। वहीं चुनाव में एनडीए लाभकारी योजनाओं के साथ प्रचार में लगी थी तो महागठबंधन के नेता एसआईआर का मुद्दा बनाने में लगे थे। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि एनडीए के मुकाबिक महागठबंधन ने लोगों के अंदर अपना नैरेटिव नहीं बना पाई।
चुनावी राजनीतिकार प्रशांत किशोर की नीति फेल
बिहार चुनाव में सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाली पार्टी जन सुराज का खाता तक नहीं खुला। चुनाव घोषणा होने से पहले प्रशांत किशोर मीडिया और सोशल मीडिया के मुख्य केंद्र में थे। बिहार की सबसे बड़ी समस्या पलायन और रोजगार और शिक्षा का मुद्दा केंद्र में लाया लेकिन सोशल गणित में फेल दिखे। चुनाव शुरू होते ही उनके उम्मीदवार और कार्यकर्ता जनता तक पहुंचने में नाकाम दिखे जहां बाकी दलों के नेता अपनी चुनावी सभाएं करते नजर आए वहीं प्रशांत किशोर चुनावी फील्ड से गायब दिखे। जन सुराज के बिहार चुनाव में चयनित उम्मीदवार का चुनावी परिणाम में खस्ता हाल दिखा।