Rahul / Udantak.in
प्राचीन प्रेम की वह कहानी, जिसमें प्रकृति की नमी है, विरह की पीड़ा है और स्मृति की कसक जब रंगमंच पर आकार लेती है, तो वह केवल दृश्य नहीं, बल्कि आत्मा को स्पर्श करने वाला अनुभव बन जाती है। प्रयागराज के रवीन्द्रालय ऑडिटोरियम में 26 मार्च 2026 की संध्या कुछ ऐसी ही भावनाओं से भीग उठी, जब महाकवि कालिदास की अमर कृति ‘अभिज्ञान शाकुंतलम’ ने मंच पर सांस ली।

विश्व रंगमंच दिवस की पूर्व संध्या पर प्रस्तुत इस नाट्यकृति ने जैसे समय की सीमाओं को तोड़ दिया। सभागार में बैठे दर्शक अचानक स्वयं को एक हरित, शांत वन में पाते हैं जहां पत्तों की सरसराहट में प्रेम की आहट है और हवाओं में एक अनकहा संगीत। इसी सन्नाटे को चीरते हुए प्रवेश होता है राजा दुष्यंत का वीर, तेजस्वी, किंतु भीतर से प्रेम के स्पर्श को तरसता हुआ। उनकी दृष्टि जैसे ही शकुंतला पर ठहरती है, समय मानो थम जाता है। उनका संवाद, “हे सुंदरी, तुम्हारी सरलता ने मेरे हृदय को बंदी बना लिया है,” केवल शब्द नहीं, बल्कि प्रेम की पहली धड़कन बनकर पूरे सभागार में गूंज उठता है।

शकुंतला यह केवल एक पात्र नहीं, बल्कि संवेदनाओं का सजीव रूप है। रूपाली मिश्रा ने इस भूमिका में जिस गहराई से प्राण फूंके, वह दर्शकों को भीतर तक छू गया। एक निष्कलुष, चंचल आश्रम-कन्या से लेकर प्रेम में डूबी, विरह में तड़पती और अंततः अपमान के बीच भी आत्मसम्मान को थामे खड़ी स्त्री तक उनका रूपांतरण एक भावनात्मक यात्रा बन गया। दरबार का वह मार्मिक क्षण, जब वह कांपती आवाज़ में कहती है, “यदि स्मृति ही सत्य है, तो मेरा प्रेम भी एक दिन तुम्हारी स्मृतियों में लौटेगा,” जैसे हर दर्शक के हृदय पर दस्तक देता है। उस पल सभागार में सन्नाटा नहीं, बल्कि टूटते हृदयों की अनसुनी गूंज थी।

दुष्यंत का चरित्र भी इस कथा की त्रासदी और मोक्ष दोनों को समेटे हुए है। सुख सागर उपाध्याय ने इस भूमिका को केवल निभाया नहीं, बल्कि जिया। प्रेम में डूबा राजा, श्राप से विस्मृत शासक और अंततः अपराधबोध से टूटता हुआ मनुष्य इन तीनों रूपों के बीच उनका परिवर्तन इतना स्वाभाविक था कि दर्शक उनके साथ-साथ उस पीड़ा को महसूस करने लगे। जब उन्हें अपनी भूल का एहसास होता है और वे व्याकुल होकर कहते हैं, “मैंने तुम्हें नहीं, अपने ही अस्तित्व को खो दिया,” तो वह क्षण केवल अभिनय नहीं, बल्कि आत्मस्वीकार की चरम पीड़ा बन जाता है।

ऋषि दुर्वासा का श्राप इस कथा में वज्रपात की तरह आता है। नितीश कुमार ने अपने तेजस्वी अभिनय से उस क्रोध, उस तप और उस कठोरता को जीवंत कर दिया, जिसने प्रेम को विरह में बदल दिया। वहीं प्रियंवदा और अनसूया के रूप में सजी मित्रता ने इस पीड़ा में भी स्नेह की हल्की रोशनी बनाए रखी।
मंच सज्जा मानो चित्रकार की कूची से उकेरी गई थी हर दृश्य जीवंत, हर प्रकाश एक भाव को उभारता हुआ। बांसुरी की मधुर तान और पार्श्व गायन ने वातावरण को ऐसा बना दिया, जैसे स्वयं प्रकृति इस प्रेम कथा की साक्षी बनकर गुनगुना रही हो। वेशभूषा और रूपसज्जा ने पात्रों को केवल सजाया नहीं, बल्कि उन्हें उस युग में पुनर्जीवित कर दिया।

यह प्रस्तुति केवल एक नाटक नहीं थी यह प्रेम की उस अग्नि का अनुभव थी, जो श्राप से बुझती नहीं, बल्कि और अधिक प्रज्वलित हो उठती है। यह स्मृति और विस्मृति के बीच झूलते हृदय की कहानी थी, जो अंततः अपने सत्य को खोज ही लेता है। ‘अभिज्ञान शाकुंतलम’ ने एक बार फिर सिद्ध कर दिया कि सच्चा प्रेम समय, दूरी और परिस्थितियों से परे होता है वह हर युग में उतना ही जीवंत, उतना ही व्याकुल और उतना ही सुंदर रहता है।