Sandeep kumar / Udantak.in
कुछ फ़िल्में ऐसी होती हैं जो दर्शक के दिमाग़ की नसें झिंझोड़ देती है और मन की गहराई में बैठ कर उसको समाज के यथार्थ में छिपे अमानवीयता कचोटती है। ठीक ऐसी ही एक फ़िल्म साल 2000 में बनी “हरी भरी” है। जिसके निर्देशक दिवंगत श्याम बेनेगल हैं। श्याम बेनेगल की फ़िल्में अक्सर ही दर्शक के दिल और दिमाग़ को संवेदनशीलता और बौद्धिकता से समृद्ध करती है। उनके फिल्मों की पटकथा और कैमरे की लेंस हमेशा भारतीय समाज में हाशिए के वर्ग को रेखांकित करती रही है।

श्याम बेनेगल की फ़िल्म “हरी-भरी” भी एक ऐसे ही वर्ग अर्थात् समाज की आधी आबादी यानी महिलाओं से जुड़ा हुआ है, जो धार्मिक और सामाजिक मान्यताओं के दबाव में और एक पितृसत्तात्मक व्यवस्था में शोषण का शिकार होती रही हैं। दरअसल, यह फिल्म महिलाओं के स्वास्थ्य और समाज में उनके अधिकार को प्रदर्शित करती है। इस फ़िल्म का एक प्रमुख स्पॉन्सर तत्कालीन भारत सरकार की ‘स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय’ है।
फ़िल्म का आरंभ शाबाना आज़मी की आवाज़ में एक गीत से होता है, जिसके बोल हैं “मैं कित्ती बार बोला ना जी उजला कपड़ा पहनो नको, काला कपड़ा पहनो नको, तू सदा सुबस परी रहे, गोदी ‘हरी-भरी’ रहे!…” ये गीत एक स्त्री की स्वेच्छा की उपेक्षा और समाज में उसकी भूमिका के मानदंड यथा वह सदैव मनमोहन और युवा दिखे एवं बच्चों को जन्मती रहे, बताता है।

इस फिल्म में एक भारतीय मुस्लिम परिवार को दिखाया गया है। दरअसल, यह एक परिवार चूल्हे पर खौलते उस अदहन की तरह है जिसका एक दाना मसल कर समूचे चावल के पकने का अन्दाज़ मिल जाता है। ठीक उसी तरह यह एक परिवार उस पूरी भारतीय समाज का प्रतिनिधित्व करता है जो अपने रूढ़ीवादी मान्यताओं के साथ महिलाओं के स्वास्थ्य को अनदेखा कर उसके प्रजनन के अधिकार को ख़ुदा की नेमत समझता है। फिल्म में हसीना बेगम का एक संयुक्त परिवार है। जिसमें उनके दो बेटे ख़लील और ख़ुर्शीद और दो बहुएं नज़्मा और अफ़साना हैं और एक बेटी ग़ज़ाला है, जो अपने शौहर को एक वारिस ना दे पाने के कारण मायके में ही रह रही है एवं गज़ाला की एक बेटी सलमा भी है, एक दाई भी है जो सबके घरों में बर्तन धोती है।
मेरे नज़र से पांचों महिलाएं “हसीना, ग़ज़ाला, नज़्मा, अफ़साना और सलमा” इस फिल्म की प्रमुख किरदार हैं। इसमें एक छठी महिला किरदार भी है जो एक नवजात बच्ची है, जो जन्म के कुछ दिन बाद मरहूम हो जाती है। उस दृश्य पर फिल्मकार दूसरी गीत सुनाता है “अगले जन्म मोहे बिटिया ना कीजो, कीजो तो जल्दी उठाए मोहे लीजो।” दरअसल, इस फ़िल्म के हरेक किरदार समाज की विद्रूपताओं को बड़ी बारीकी से दिखाते हैं गोया फ़िल्म की शुरुआत में ग़ज़ाला अपने शौहर की प्रताड़न से घर छोड़कर मायके यानी हसीना बेगम के घर जाती है और ठीक उसी वक्त फिल्मकार एक पशुपालक को एक भैसे के साथ उसी घर जाते हुए दिखाता है, जो ख़लील मियां के मोती भैंस को गर्भाधारण के लिए जाता है। फिल्मकार यहां पर भी एक मादा भैंस की उपयोगिता को दिखाता है क्योंकि उस भैंस की उपादेयता उसकी पौष्टिक दूध देने से है।

इसी तरह श्याम बेनेगल इस फ़िल्म में मुख्य पांचों महिला किरदारों की कहानी को दिखाते हैं, जिनकी अपनी-अपनी एक अलग कहानी है। हसीना बेगम अपने बुआ के लड़के से प्रेम करती थी, किन्तु परिस्थितिवश कच्ची उम्र में ही अपने पिता समान एक बुजुर्ग रिश्तेदार से निकाह करती हैं। फ़िल्म ऐसे ही नज़्मा, अफ़साना और सलमा की अलग अलग कहानी को दिखाता है। अंत में सलमा जो शिक्षिका बनना चाहती थी उसे भी कम उम्र में उससे तिगुने उम्र के पुरुष से ब्याहने की बात शुरू होती है किन्तु हसीना की गंभीर बिमारी का कारण सलमा को उस शोषण के जाल में फंसने से बचा देता है। ठीक उसी वक्त फ़िल्म की तीसरी और आखिरी गीत बजती है, जिसके बोल हैं -“पंछी रे पंछी रे उड़ान हमका दई दे , हम भी उड़े थोड़ा आसमान हमका दई दे!”
-लेखक Sandeep Kumar इलाहाबाद विश्वविद्यालय से परास्नातक (एम.ए.) हिंदी साहित्य के छात्र हैं।