रिपोटिंग by Rahul
मनरेगा का नाम बदलकर जी राम जी किया गया। नाम के साथ कानून में क्या-क्या हुए बदलाव ?
भारत गांवों का देश है और उसकी आत्मा गांव में बसती है, क्योंकि भारत की लगभग 70 फ़ीसदी आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करती है। इन ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी, निरक्षरता,बेरोज़गारी, कुपोषण और अल्प स्वास्थ्य आदि कई सामाजिक और आर्थिक समस्याएं व्याप्त हैं। इन बहुआयामी समस्याओं से निपटने के लिए सरकार ने ग्रामीण जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाने हेतु समय -समय पर विभिन्न ग्रामीण विकास कार्यक्रम लागू किए हैं।
इसी क्रम में यूपीए फ़स्ट की सरकार द्वारा महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (महात्मा गांधी – मनरेगा) को ग्रामीण जीवन की गुणवत्ता में सुधार लाने के उद्देश्य से बनाया गया था। अब मौजूदा एनडीए सरकार ने इस क़ानून को संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान इसके बदले ‘वीबी-जी राम जी’ विधेयक रुप में प्रस्तावित कर 16 दिसंबर 2025 को दोनों सदनों से पारित कर दिया है, जिसमें पहले की मनरेगा में प्रयुक्त प्रावधानों में कुछ क़ानूनी बदलाव किया गया है।
मनरेगा भारत सरकार द्वारा ग्रामीण गरीबों के लिए उठाया गया एक क्रांतिकारी कदम है और वर्तमान में यह भारत का सबसे बड़ा स्व-लक्षित कार्यक्रम है। ग्रामीण विकास मंत्रालय के 2023-24 के रिपोर्ट के अनुसार कुल 24.81 करोड़ श्रमिकों को रोज़गार मिला, जिनमें से 13.05 करोड़ सक्रिय श्रमिक हैं वित्त वर्ष 2013-14 और वित्त वर्ष 2025-26 के बीच महिलाओं की सहभागिता 48 प्रतिशत से धीरे-धीरे बढकर 58.15 प्रतिशत हो गई है।
‘वीबी-जी राम जी’ का उद्देश्य तथा कानूनी तबदीली.
मनरेगा के तहत प्रत्येक ग्रामीण परिवार को, जिसके वयस्क सदस्य स्वेच्छा से अकुशल शारीरिक श्रम करना चाहते हैं, एक वित्तीय वर्ष में कम से कम 100 दिनों का रोज़गार सुनिश्चित किया जाता है। बिल में यह गारंटी बढ़ाकर 125 दिन कर दी गई है। मनरेगा के तहत, अगर किसी काम की तलाश करने वाले व्यक्ति को 15 दिनों के भीतर रोजगार नहीं मिलता है, तो राज्य सरकार को अनिवार्य रूप से उसे बेरोज़गारी भत्ता देना होगा। बिल में इस प्रावधान को बरकरार रखा गया है।
नए बिल में प्रस्ताव है कि इसके तहत होने वाले कुल खर्च का 60 प्रतिशत केंद्र सरकार वहन करेगी जबकि 40 प्रतिशत खर्च राज्य सरकार उठाएगी. जबकि पहले राज्यों का ख़र्च क़रीब 10% ही था.
नए प्रावधान के मुताबिक़ पूर्वोत्तर के राज्यों, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और अन्य केंद्र शासित प्रदेशों में केंद्र सरकार इसके तहत होने वाला 90 फ़ीसदी ख़र्च ख़ुद उठाएगी.
यह विधेयक मनरेगा में व्यापक वैधानिक बदलाव का प्रतिनिधित्व करता है, जो ग्रामीण रोज़गार को विकसित भारत 2047 के महत्वाकांक्षी विज़न के साथ संयोजित करता है तथा ज़वाबदेही, बुनियादी ढांचे के परिणामों और आय सुरक्षा को सुदृढ़ करता है।
प्रमुख बिंदु:
1. इसका उद्देश्य ग्रामीण श्रमिकों को प्रति वर्ष कम से कम हर ग्रामीण परिवार को 125 दिन गारंटीकृत गैर-कुशल शारीरिक रोजगार प्रदान करना है।
2. मजदूरी दर कम नहीं हो सकती तथा भुगतान 15 दिनों के भीतर अनिवार्य क्षेत्र के अनुसार अलग-अलग मजदूरी दर संभव।
3. अगर 15 दिन के भीतर काम नहीं दिया गया तो पहले 30 दिन मजदूरी का कम से कम ¼ तथा बाद की अवधि मजदूरी का कम से कम ½ भत्ता भी समय पर देना अनिवार्य।
4. बुआई और कटाई के समय ग्रामीण श्रमिकों को खेती के लिए उपलब्ध रखने हेतु राज्य सरकारें कृषि-व्यस्त मौसम अधिसूचित करेंगी उस समय योजना के काम शुरू नहीं होंगे।
5.बाढ़, सूखा, महामारी जैसी स्थितियों में अतिरिक्त काम नियमों में ढील ज्यादा दिन का रोजगार तेज़ भुगतान।
6.कामों की योजना ग्राम सभा और पंचायत बनाएगी चार प्राथमिक क्षेत्र, जल सुरक्षा, ग्रामीण बुनियादी ढांचा, आजीविका से जुड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर, जलवायु/आपदा जोखिम न्यूनीकरण।
7. डिजिटल और पर्दाशी सिस्टम, GPS आधारित कार्यस्थल, रियल-टाइम मॉनिटरिंग, डैशबोर्ड और MIS, सोशल ऑडिट (सामाजिक अंकेक्षण), शिकायत निवारण तंत्र।
8.यह एक केंद्र प्रायोजित योजना है, फंड का बंटवारा केंद्र और राज्य के बीच, पहाड़ी और पूर्वोत्तर राज्यों को विशेष सहायता।
विपक्ष क्यों कर रहा है विरोध
केंद्र सरकार के प्रस्ताव में कई ऐसे प्रावधान हैं जो इस योजना में रोज़गार की गारंटी को ख़त्म कर रहा है. फ़िलहाल यह योजना पूरे देश में लागू है लेकिन नए प्रस्ताव में सेक्शन 5 (1) में लिखा हुआ है कि यह योजना कहां लागू होगी, यह केंद्र सरकार तय करेगी.
अब केंद्र सरकार इसके मापदंड तय करेगी कि किस राज्य को कितना पैसा देना है. वो जितना पैसा देगी उसी के मुताबिक़ योजना लागू होगी और अब राज्यों को बजट का 40% हिस्सा ख़र्च करना होगा.
राज्यों की आर्थिक स्थिति पहले से ही ख़राब है और उनपर बोझ बढ़ेगा तो वो डिफॉल्ट करेंगे या योजना में उनकी दिलचस्पी कम होगी, क्योंकि रोज़गार की जितनी मांग होगी, राज्यों का ख़र्च उतना बढ़ेगा.
मनरेगा में बदलाव को लेकर एक विवाद इसके नाम पर जताया गया है. कांग्रेस पार्टी का आरोप है कि इस योजना से महात्मा गांधी का नाम हटा दिया गया है. आज़ादी के बाद ऐसा पहली बार हुआ है जब किसी योजना से महात्मा गांधी का नाम हटाया गया हो.
नए प्रस्ताव में योजना को जल संसाधन, रोड, डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर और रूरल हाउसिंग से जोड़ा गया है, जिनके लिए पहले से मंत्रालय है. ऐसा दिखता है कि सरकार मनरेगा के बजट को डायवर्ट करना चाहती है. इससे यह योजना पूरी तरह पटरी से उतर सकती है.