मेरा प्रेम खून की तरह बहा
जाँघों के बीच से, चादर तकिये भिगोता हुआ
सफ़ेद ज़मीन को लाल करता हुआ
तुम्हारी उँगलियों के बीच से रिसता गया
रात की सबसे सुंदर याद की तरह
तुम्हें प्रेम चाहिए था, देने की काबिलियत से कोसों दूर
मुझे प्रेम देना आता था – नदी की तरह, मैं प्रेम देती गई
खून की तरह, मैंने जाने कितने यूनिट प्रेम दिया
तुम्हारा नाम उसके नाम से इतना अलग क्यों है
तुम तो बिल्कुल उसके जैसे हो
मैंने तुम दोनों को चाहा, तुम दोनों ने मेरे शरीर को
मेरे प्रेम का बहता ज़रिया बस मेरा बदन ही तो बना
क्या नया हुआ?
मेरा प्रेम फिर खून की तरह बहा
कितना डरावना है एक इंसान के लिए
‘बॉडी काउन्ट’ में तब्दील हो जाना
उसकी सारी छुअन, सारी स्मृतियों, संसर्गों का
एक गिनती में सिमट जाना
तुम्हारे हाथ मेरी योनि से निकले खून से पहली दफ़ा लाल हुए थे
मैंने तुम्हारे हाथ आश्चर्य से छुए थे, खुद को महसूस किया था
और तुमने मुझे एक गिनती में समेटकर कहा
“मेरा बॉडी काउन्ट अब सात हो गया”
मेरा प्रेम फिर खून की तरह बहा
रचनाकार : शिवांगी गोयल