रिपोटिंग by Shivam
बनारस की गौदौलिया में बसा यह चौक मानव जीवन के सार को चार दिशाओं में समेटे है. घर की ओर अर्थ, बाजार की ओर काम, विश्वनाथ मंदिर की ओर धर्म, और मणिकर्णिका घाट की ओर मोक्ष की याद दिलाता यह प्रतीकात्मक केंद्र
बनारस, या कहें काशी, वो शहर जो इतिहास, परंपरा और मिथकों से भी पुराना है। यहां गंगा अपनी दिशा बदल देती है, भीड़ में सुकून छिपा होता है, और मृत्यु भी एक उत्सव बन जाती है। इस शहर में हर गली, हर चौराहा एक दार्शनिक रहस्य छिपाए बैठा है। लेकिन आज हम बात करेंगे काशी के दिल में बसे उस चौक की, जो मानव जीवन के सार को अपनी चार दिशाओं में समेटे हुए है. नंदी चौक। गौदौलिया में स्थित यह चौक न सिर्फ एक भौगोलिक केंद्र है, बल्कि जीवन की गहन यात्रा का प्रतीक, जहां अर्थ, काम, धर्म और मोक्ष के धागे आपस में गुंथे हुए हैं।
काशी के पुरोहितों और आध्यात्मिक विद्वानों के अनुसार, नंदी चौक मानव जीवन के चार महत्वपूर्ण अंगों को दर्शाता है। यह चौक, जो शिव के वाहन नंदी की याद दिलाता है, एक अबोध मन को भी वेदों की गहराई समझा सकता है। यहां से निकलने वाले चार मार्ग जीवन की चार दिशाओं की तरह हैं. प्रत्येक एक सिद्धांत को जीवंत रूप देता है। जब मैंने स्थानीय निवासियों से इसकी कहानी सुनी, तो लगा जैसे काशी की आत्मा खुद बोल रही हो।

पहला मार्ग: अर्थ। यह रास्ता घर की ओर जाता है, जहां जीवन की बुनियाद टिकी है। अर्थ से तात्पर्य है संपत्ति, स्थिरता और परिवार का सुख। काशी में घर न सिर्फ आश्रय है, बल्कि वह नींव जहां से जीवन की यात्रा शुरू होती है। यहां की गलियां बताती हैं कि बिना अर्थ के कोई भी सिद्धांत अधूरा है, जैसे बिना जड़ों के वृक्ष।
दूसरा मार्ग: काम। यह दलमंडी की ओर मुड़ता है, जहां कर्म का संसार फैला है। काम यहां इच्छाओं और क्रियाओं का प्रतीक है – मेहनत, संघर्ष और सृजन का। दलमंडी की हलचल भरी बाजारों में जीवन की ऊर्जा महसूस होती है, जहां हर कदम कर्म की याद दिलाता है। काशी कहती है, काम के बिना जीवन स्थिर नहीं, वह तो बहता हुआ नदी है जो गतिमान रहकर ही अपनी मंजिल पाती है।
तीसरा मार्ग: धर्म। यह सीधे काशी विश्वनाथ मंदिर की ओर ले जाता है, जहां भक्ति का सागर उमड़ता है। धर्म यहां नैतिकता, कर्तव्य और आस्था का रूप लेता है। बाबा विश्वनाथ के दर्शन में जो शांति मिलती है, वह जीवन की उथल-पुथल में एक प्रकाशस्तंभ की तरह है। काशी के इस मार्ग पर चलते हुए लगता है, जैसे हर घंटी की ध्वनि आत्मा को जगा रही हो, याद दिला रही हो कि जीवन का सार भक्ति में छिपा है।
चौथा मार्ग: मोक्ष। यह मणिकर्णिका घाट की ओर जाता है, जहां जीवन का अंत एक नई शुरुआत बन जाता है। मोक्ष – मुक्ति का प्रतीक, जहां शरीर छूटता है और आत्मा अनंत में विलीन हो जाती है। काशी में मृत्यु कोई शोक नहीं, बल्कि उत्सव है। मणिकर्णिका की चिताओं की लपटें बताती हैं कि जीवन चक्रव्यूह है, और मोक्ष उसका अंतिम द्वार। यहां की गंगा मां हर आत्मा को शुद्ध कर मोक्ष प्रदान करती है, जैसे एक मां अपने बच्चे को नींद की गोद में सुलाती हो।

काशी क्यों श्रेष्ठ है? क्योंकि यह न सिर्फ महादेव की नगरी है, बल्कि मसान की भी। यहां वर्षों से मणिकर्णिका की चिताएं जलती रही हैं, मृत देहों को अमरत्व प्रदान करती हुईं। बाबा विश्वनाथ का आशीर्वाद, अन्नपूर्णा का प्रसाद, और गंगा का स्पर्श सब मिलकर इस शहर को दिव्य बनाते हैं। काशी ने मृत्यु के बाद के जीवन को स्थान दिया, उसकी गति को समझा, और चिता को विराट महत्व प्रदान किया। यहां 64 योगिनियां, 12 सूर्य, 56 विनायक, 8 भैरव, 9 दुर्गा, 42 शिवलिंग, 9 गौरी, महारुद्र और 12 ज्योतिर्लिंग सब एक साथ सांस लेते हैं। यह शहर जीवन के हर पहलू को गले लगाता है. उलटा-पुलटा, लेकिन सत्य।
नंदी चौक की यह कहानी सिर्फ एक चौक की नहीं, बल्कि पूरी मानवता की है। काशी की गलियों में घूमते हुए लगता है, जैसे हर पत्थर एक सिद्धांत फुसफुसा रहा हो। यह शहर हमें सिखाता है कि जीवन चार सिद्धांतों का संगम है. अर्थ से शुरू, काम से गतिमान, धर्म से संतुलित, और मोक्ष में समाप्त। काशी, तुम श्रेष्ठ हो, क्योंकि तुम जीवन को जीने का नहीं, समझने का तरीका सिखाती हो। यहां आकर हर यात्री खुद को पाता है, और खोकर भी अमर हो जाता है।
-लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय से परास्नातक (एम.ए.) हिंदी साहित्य के छात्र हैं।